Nov 23, 2020
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कमबख़्त इश्क़

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कमबख़्त इश्क़ में मेरा रूआब भी गया ।
शराबी भी गया वजूद-ए-शराब भी गया ।
इतना भी गुरुर अच्छा नहीं बेदाग़ हुस्न पे,
गुरुर में शबाब का हुस्न-ओ-शबाब भी गया ।
शानो शौकत से रहते थे जिस महल-ए-अना में,
उसमें नवाबी भी गई, उसका नवाब भी गया ।
सवाल कभी पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई, तो
सवाल के साथ साथ उसका जवाब भी गया ।
एक छोटी सी गलती क्या हो गयी मुझसे,
अब मेरे हिस्से से उनका आदाब भी गया ।
और वो तो अपने अपने वक़्त की बात है जनाब
दिन ढ़लते ही शम्स,तो चढ़ते महताब भी गया ।
Article Categories:
Literature

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