May 31, 2021
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महिलाओं और लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता को बनाये रखने के लिए जरूरी है पुन: इस्तेमाल करने योग्य पैड का इस्तेमाल

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भारत में मासिक धर्म की उम्र की हर महिला और लड़की यदि डिस्पोजेबल पैड ,का इस्तेमाल करेगी, तो हर महीने 38,500,000,000 इस्तेमाल किए गए पैड
फेंक दिए जाएंगे जो कि पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है क्योंकि इनमें से, प्रत्येक पैड को स्वाभाविक रूप से नष्ट होने में 500-800 साल लगेंगे।

डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड के कारण हर महीने भारी मात्रा में गैर- बायोडिग्रेडेबल कचरे जमा हो रहे हैं जो पर्यावरण के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो रहे हैं। इस
बात को ध्यान में रखते हुए माता अमृतानंदमयी मठ के अमृता सर्व (सेल्फ रिलायंट विलेज) कार्यक्रम की सह-निदेशक अंजू बिष्ट ने कहा कि भारत में स्थायी मासिक धर्म स्वच्छता केवल जैविक सामग्री
से बने पुन: इस्तेमाल योग्य पैड के इस्तेमाल से ही प्राप्त की जा सकती है।

भारत की "पैड वुमन ” के रूप में विख्यात अंजू बिष्ट कपड़े और केले के रेशे से बने सैनिटरी पैड के उपयोग और पुन: उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जानी जाती हैं। वह सौख्यम रियूजेबल पैड की सह- निर्माता हैं, जिसे राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान, हैदराबाद ने "सबसे नवीन उत्पाद”  के रूप में सम्मानित किया है। 2018 में पोलैंड में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भी
इस पैड की सराहना की गई थी।

अंजू बिष्ट ने कहा‚ “राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मासिक धर्म की उम्र वाली साढ़े 35 करोड़ महिलाएं और लड़कियां हैं। कम आय वाले समुदायों की कई महिलाओं
और लड़कियों की अभी भी अपने मासिक धर्म को प्रबंधित करने के लिए स्वच्छ उत्पादों तक पहुंच नहीं है। ऐसी महिलाओं को सस्ते डिस्पोजेबल पैड उपलब्ध कराने के लिए कई संगठन प्रयास कर रहे
हैं। लेकिन अगर भारत में मासिक धर्म की उम्र की हर महिला और लड़की डिस्पोजेबल पैड का इस्तेमाल करती है, तो हर महीने 38,500,000,000 इस्तेमाल किए गए पैड फेंक दिये जाएंगे। गंदे
पैड से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है? इन्हें जलाने से हानिकारक डाइऑक्सिन और फुरान निकलते हैं। उन्हें मिट्टी में दबाना भी ठीक नहीं है क्योंकि ये पैड गैर-बायोडिग्रेडेबल होते हैं। हर पैड में
प्लास्टिक होता है, और इसे नष्ट होने में 500 से 800 वर्ष लगेंगे। कोई भी इस कचरे को हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए नहीं छोड़ना चाहेगा।”

सौख्यम रियूजेबल पैड केले के फाइबर से बनने वाला दुनिया का पहला पैड है, जो स्वाभाविक रूप से सोखने वाले पदार्थ से बना है। यह अपने वजन का छह गुना तरल पदार्थ अवशोषित करता है! दूसरी
ओर, डिस्पोजेबल पैड में सोखने के लिए सेल्यूलोज फाइबर का उपयोग किया जाता है। सेल्यूलोज प्रेस विज्ञप्ति फाइबर के लिए हर साल दुनिया भर में अरबों पेड़ काटे जाते हैं‚ इसके विपरीत केले का फाइबर कृषि- अपशिष्ट से प्राप्त होता है। डिस्पोजेबल पैड बनाने के लिए भारत में इस्तेमाल होने वाले सभी सेल्युलोज फाइबर का आयात किया जाता है। जबकि केला का फाइबर स्थानीय रूप से उपलब्ध है।
इसकी आपूर्ति असीमित और सस्ती है क्योंकि भारत दुनिया में केले का सबसे बड़ा उत्पादक है।

शिक्षित और जागरूक युवा महिलाएं न केवल पर्यावरणीय चिंताओं के कारण, बल्कि डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड के उपयोग के संभावित स्वास्थ्य खतरों के कारण भी पुन: इस्तेमाल किये जाने वाले
उत्पादों को अपना रही हैं। अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, कोच्चि की डॉ. सिरीशा ने कहा‚ “लड़कियों और महिलाओं को डिस्पोजेबल पैड में केमिकल ऐडिटिव और विषाक्त पदार्थों से स्वास्थ्य
संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन पैड में सोखने वाले पदार्थ के रूप में सेल्यूलोज फाइबर का उपयोग किया जाता है। शुद्ध सफेद रंग प्राप्त करने के लिए इस फाइबर को ब्लीच किया
जाता है जिससे पैड पर भारी मात्रा में हानिकारक डाइऑक्सिन मौजूद होते हैं। योनि क्षेत्र में त्वचा अत्यधिक नाजुक और पारगम्य (पर्मियेबल) होती है। कोई भी चीज जो लगातार त्वचा के संपर्क में
रहती है, वह रक्तप्रवाह में जा सकती है। डाइऑक्सिन अंतःस्रावी अवरोधक है और मानव जाति क लिए ज्ञात सबसे हानिकारक पदार्थों में से है।”

अंजू बिष्ट ने कहा‚ "हर सौख्यम रियूजेबल पैड 3 साल तक चलता है, और पांच पैड के एक पैक की कीमत केवल 330 रुपये है। इसके विपरीत, भारत में एक औसत महिला डिस्पोजेबल पैड खरीदने पर हर महीने 50-100 रुपये खर्च करती है, इस तरह हर साल और जीवन में पूरे मासिक धर्म के दौरान इस पर काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में भी, महिलाएं और लड़कियां मासिक
धर्म स्वच्छता के लिए एक बेहतर उत्पाद का इस्तेमाल करना चाहती हैं। भारत और दुनिया भर में 200,000 से अधिक महिलाओं और लड़कियों ने सौख्यम रियूजेबल पैड का इस्तेमाल करना शुरू कर
दिया है। यह सालाना 812 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन को रोकने में मदद कर रहा है और इसने 17,500 टन गैर-बायोडिग्रेडेबल मासिक धर्म कचरे को समाप्त कर दिया है।
भारत में अब रियूजेबल सैनिटरी पैड (आईएस 17514:20) के लिए आईएसओ मानक हैं। दुनिया भर के बड़े व्यवसाय ऐसे सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांतों को अपनाने लगे हैं जिसमें कोई बर्बादी नहीं होती
है। किसी उत्पाद के उपयोगी जीवन-चक्र के बाद जो बचा है उसे उत्पादन के अगले चक्र में कच्चे माल के रूप में फिर से उपयोग किया जाता है। केवल एक बार उपयोग किए जाने और फिर फेंक
दिये जाने वाले उत्पाद इस नई अर्थव्यवस्था में इतने लोकप्रिय नहीं हैं। अंजू बिष्ट ने कहा‚ “पुन: इस्तेमाल किये जाने वाले मासिक धर्म पैड को अपनाने का समय आ गया है। ऐसे पुन: इस्तेमाल
किये जाने वाले उत्पाद न केवल कई उपभोक्ताओं को पैसे बचाने में मदद कर रहे हैं, बल्कि वे कई महिलाओं को बेहतर विकल्प भी दे रहे हैं। मासिक धर्म की स्वच्छता को सुलभ और वहन करने
योग्य बनाने का यही एकमात्र स्थायी तरीका है।”

माता अमृतानंदमयी मठ की टीम ने हाल ही में सौख्यम रियूजबल पैड के शहरी और ग्रामीण दोनों
उपयोगकर्ताओं पर किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन को प्रकाशित किया है। यह मार्च 2021 में
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका बीएमसी वुमेन्स हेल्थ (स्प्रिंगर नेचर का हिस्सा) में प्रकाशित हुआ था।

“भारत में मासिक धर्म स्वच्छता के लिए एक नया केला फाइबर पैड: एक व्यवहार्यता और स्वीकार्यता
अध्ययन" शीर्षक वाले शोध पत्र को अमृता विश्वविद्यालय के पीजी प्रोग्राम के डीन डॉ कृष्णश्री
अच्युतन, अंजू बिष्ट और तीन अन्य सहयोगियों ने तैयार किया था। यह व्यापक अध्ययन भारत में
155 ग्रामीण और 216 शहरी प्रतिभागियों के बीच किया गया था, जिन्होंने पुन: इस्तेमाल किये जाने
वाले पैड का इस्तेमाल करना शुरू किया था। इस अध्ययन के तहत कार्बन डाई ऑक्साइड फुटप्रिंट
विश्लेषण, माइक्रोबियल लोड, पीएच और अवशोषण के बाद दबाव को झेलने की पुन: इस्तेमाल किये
जाने वाले पैड की क्षमता जैसे मापदंडों का भी अध्ययन किया गया। इस अध्ययन की विस्तृत
जानकारी यहां उपलब्ध है :
https://bmcwomenshealth.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12905-021-01265-w
अध्ययन के परिणामों के बारे में बात करते हुए, डॉ कृष्णश्री अच्युतन ने कहा‚ "हमारे अध्ययन के
नतीजे दोनों प्रतिभागी समूहों में केले के फाइबर से बने पैड के उच्च स्तर की व्यवहार्यता (ग्रामीण =
82.2%, शहरी = 80.3%) और स्वीकार्यता (ग्रामीण = 80.2%, शहरी = 77.5%) का संकेत देते हैं।
इस पैड की रिसाव जैसी प्रमुख विशेषताओं और प्रतिभागियों के आराम की तुलना करने पर पैड के
प्रदर्शन से प्रतिभागियों ने संतुष्टि जाहिर की, और वे दूसरों को भी पैड की सिफारिश करने लगे। केले
के फाइबर से बने पैड की उनकी प्राथमिकता के कारणों के बारे पूछे जाने पर उन्होंने निर्णायक
कारकों के रूप में पर्यावरण, स्वास्थ्य और कीमत के प्रति अपनी चिंता जाहिर की। 3 साल तक पुन:
उपयोग किए गए पैड पर माइक्रोबियल लोड बिना इस्तेमाल किये गये पैड के समान पाया गया।
रिग्रेशन विश्लेषण में विशेष रूप से ग्रामीण उपयोगकर्ताओं के बीच विश्लेषण में व्यवहार्यता और
स्वीकार्यता के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में कीमत को पाया गया।ʺ

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